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Toyota War: दो देशों के बीच हुए युद्ध का नाम इस कार कंपनी के नाम पर क्यों पड़ गया?

साल 2020 में जापानी कंपनी Toyota ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। गौरतलब है कि पिछले साल 95 लाख यूनिट कारों बिक्री के साथ टोयोटा दुनियाभर में सर्वाधिक कार बेचने वाली कंपनी बन गई। Toyota ने ये उपलब्धि जर्मन ऑटोमोबाइल कंपनी फॉक्सवैगन (Volkswagen) को पीछे छोड़कर हासिल की। बीते साल फॉक्सवैगन ने 93 लाख यूनिट कारें बेची थीं।

आपको ये जानना दिलचस्प लग सकता है कि जिस टोयोटा को आप-हम घरेलू या टूरिज्म कारें बनाने के लिए पहचानते हैं, दुनियाभर के आतंकवादी संगठनों के लिए वह सबसे पसंदीदा वाहन निर्माता कंपनी है। यही नहीं इतिहास में एक पन्ना ऐसा भी दर्ज है जिसमें दो देशों के बीच हुई जंग को टोयोटा वॉर के नाम से जाना गया।

1972 की बात है, जब लीबिया ने चाड (अफ्रीकी देश) के उत्तरी भाग आओजोउ पर कब्जा कर लिया। इस हिस्से को लेकर दोनों देशों के बीच करीब डेढ़ दशक तक तनातनी चलती रही। इस पूरे विवाद के दौरान यूरोपियन देश फ्रांस चाड के पक्ष में था। नतीजतन, फ्रांस ने 1987 में चाड के लिए अपनी तरफ से कुछ हथियार और मदद भेजी। हथियारों के साथ फ्रांस ने 400 टोयोटा हायलेक्स (Hilux) ट्रकों का जखीरा भी चाड भेजा। इनमें से कई ट्रकों के पीछे मशीनगन के साथ एंटी टैंक और एंटी एयरक्राफ्ट मिसाइल लॉन्चर खासतौर पर जोड़े गए थे।

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टोयोटा हाइलेक्स

जंग में उलझे हुए किसी देश के लिए इस तरह की मदद पहुंचना अजीब बात थी। क्योंकि लीबिया के पास कई आधुनिक और जंगी टैंकों के साथ कई तरह के बख्तरबंद वाहन उपलब्ध थे। ऐसे में माना जा रहा था कि फ्रांस को इन छोटे कमर्शियल ट्रकों की बजाय कुछ बड़े हथियार भेजने चाहिए थे। लेकिन जानकारों का कहना है कि फ्रांस ने बहुत सोच-समझकर ये कदम उठाया था।

दरअसल, 1914 के प्रथम विश्वयुद्ध के समय ऐसा लग रहा था कि जर्मनी, फ्रांस पर फतेह हासिल कर लेगा। यहां तक कि जर्मनी की सेनाओं ने फ्रांस की राजधानी पेरिस को चारो तरफ से घेरने की पूरी तैयारी कर ली थी। इस मुश्किल घड़ी में फ्रांस को ज्यादा से ज्यादा सैनिकों की जरूरत थी  ताकि जर्मन सेनाओं को पेरिस से दूर रोका जा सके। लेकिन उस समय फ्रांस के पास ऐसा कोई जरिया नहीं था जिसकी मदद से कम से कम समय में सैनिकों को इकठ्ठा कर पाता। लेकिन तभी अप्रत्याशित ढंग से पेरिस से 600 टैक्सी कैब की मदद से 6000 से ज्यादा फ्रांसीसी सैनिकों को मरेन नदी के पास युद्ध के मैदान तक पहुंचाया गया और आश्चर्यजनक तरीके से फ्रांस ने यह जंग जीत ली। किसी युद्ध में कारों का ऐसा इस्तेमाल हमेशा के लिए एक मिसाल बन गया था।

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फ्रांस का अनुभव बेकार नहीं गया। मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि फ्रांस ने जिन टोयोटा ट्रकों को चाड की मदद के लिए भेजा था उनकी कीमत किसी जंगी टैंक की तुलना में महज 0.4 फीसदी ही थी। इससे भी बड़ी बात ये थी कि हायलेक्स ट्रक ताकत के मामले में कहीं से भी जंगी टैंकों के आगे नहीं टिकते थे। फिर भी कम वजन, चलाने में आसानी और 100किमी/घंटे की रफ्तार की जबरदस्त तेजी के साथ इन ट्रकों ने लीबिया की फौजों और उसके टैंकों के साथ एयरबेस को काफी नुकसान पहुंचाया और युद्ध का रूख ही पलट दिया।

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लीबिया की एयरफोर्स ने अपना पूरा ध्यान इन ट्रकों को खत्म करने में लगा दिया और यहीं उससे सबसे बड़ी चूक हुई। क्योंकि Toyota Hilux इतनी तेजी से दांये-बांये दौड़ रहे थे कि उन पर निशाना लगा पाना बहुत मुश्किल हो रहा था। आश्चर्यजनक ढंग से इस पूरे विवाद में जो चाड 15 सालों से लीबिया से कमजोर पड़ता रहा था, महज 400 हायलेक्स (Hilux) ट्रकों की मदद से उसका पलड़ा भारी हो गया। आखिरकार इस युद्ध में लीबिया को पीछे हटना पड़ा. फिर 1994 में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने आओजाओ पर चाड के अधिकार को स्वीकृति दे दी।

इस पूरे घटनाक्रम में किसी हीरो की तरह उभरा हायलेक्स मीडिया का ध्यान खींच चुका था। इस जंग में 400 हायलेक्स ट्रकों ने वह निर्णायक भूमिका निभाई कि यह लड़ाई हमेशा के लिए एक अनूठा उदाहरण बन गयी और इतिहास के पन्नों में ‘टोयोटा वॉर’ (Toyota War) के नाम से दर्ज हुई।

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